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हताशा (Ddisappointed) पर वार।

हताशा (Ddisappointed) पर वार।

TV पर एक Film चल रही थी Roki balboa। Sylvester Stallone कि इस Film में बढती उम्र के बावजूद एक युवा Boxer से लड़ने को तैयार एक Character कहता है- “जीवन में ये मायने नहीं रखता कि तुमने कितने वार किये, यह मायने रखता है कि तुमने कितना सहा। उनको सहते हुए लड़खड़ाते हुए किस तरह उठे”। उन्हों ने इस बात को गाँठ बाँध लिया।
वो अक्सर खुद को हताशा पते थे। उन्हें लगता था वे बेचारे हैं जिनके लिए दुनिया भर के Problems हैं। लेकिन फिर उन्हों ने एक सही Film देख ली। ऐसा नहीं कि आप Positive सोच के होने भर से हताशा न हों। हताशा आएगी ही। यह Normal है। असामान्य है तो यह कि आप ऐसे में हताशा को खुद पर Dominant नहीं होने दें। उसे एक Power बना लें।
मनोविज्ञानिक Pyar Vilsn कहते हैं कि हताशा को खुद पर अगर हावी होने दिया जाए तो यह Failure के दलदल में फंसने कि शुरुआत हो सकती है। हताशा अपने साथ Negative सोच लाती है। और आपके सोच का Method बदल जाता है। Brazilian writer Paulo Coelho कहते हैं कि परिस्थितयां जैसी हों, ज़िन्दगी का मूल सौभाव ही है Combative होना। इसे बस मौक़ा मिलना चाहए। यह खुद को दुरुस्त करने और Old Structure में लौटने कि कोशिश में जुट जाती है।
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आप जितने भी हताशा हों, बस समय के बहाओ में कुछ दिनों केलिए खुद को छोड़ दें। ज़िन्दगी खुद ही आप को अपनी पुराणी इस्तिथि में लौटा देती है। theorist Joseph Marfi का भी कहना है कि एक बुद्धि है जो हमेशा आपके Body और मन का देखभाल करती है, बशर्ते कि आप उसे यह काम करने दें। लेकिन चेतन मन हमेशा बाहरी अनुभूति और Senses के परमान के कारण इसमें हस्तछेप करता है। इससे झूठ, अविश्वाश, डर, दुर्भावना जैसी चीजें Powerful होती हैं और फिर आप के हाथों से आपकी Advancement छूटती जाती है।
नीरज कुमार तिवारी

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Absarul Haque

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