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Social Behavior खुशहाल ज़िन्दगी की कुंजी

Social behavior हमारे सारे दुखून पर पर्दा डाल भी सकता है और हमारा यही Social behavior हमें दुखों और ग़मों के चंगुल में फंसा भी सकता है.

China में एक जगह एक औरत अपने इकलौते बेटे के साथ अपनी दुनिया में गुम और खुशहाल जीवन व्यतीत रह रही थी ‘एक दिन अचानक उसके बेटे को मृत्यु ने आ दबोचा और वह अपने वास्तविक निर्माता से जा मिला. औरत के लिए यह असहनीय दुख था क्योंकि उसका बेटा ही उसके लिए पूरी दुनिया का दौलत था. उसका मन प्रकृति के इस फैसले को मानने के लिए तैयार ही नहीं था.

Social Behavior खुशहाल ज़िन्दगी की कुंजी

वह रोती पीटती गांव के वैद्य के पास गई और वैद्य से कहने लगी “वैद्य जी कोई ऐसा नुस्खा बताएं जिससे मेरा बेटा लौट आए में उसके बदले अपनी सारी जमा पूंजी खर्च करने को तयार हूँ”.

वैद्य ने एक नज़र उस दुखी महिला पर डाली और उसे गंभीरता देखते हुए काफी सोच विचार के बाद बोले “हाँ एक नुस्खा है तो सही, इलाज के लिए एक ऐसे सरसों के बीज की जरूरत है जो किसी ऐसे घर से लिया गया हो जिस घर में कभी किसी पीड़ा की परछाई तक न पड़ी हो.”

स्त्री ने कहा, “यह तो कोई समस्या ही नहीं, मैं अभी जा कर ऐसा सरसों का बीज ढूंढ कर ले आती हूँ”.

महिला के विचार में उसका गांव ही वह जगह थी जहाँ लोगों के घरों में शोक कभी भी नहीं आता था.

Social behavior का असर

बस इसी विचार को दिल में संजोए उसने गांव के पहले घर का दरवाजा खटखटाया, अंदर से एक जवान औरत निकली. इस औरत ने उस से पूछा “क्या इससे पहले तेरे घर कभी कोई दुख देखा?” जवान औरत के चेहरे पर एक कड़वाहट सी दिखाई दी और उसने दर्द भरी मुस्कान चेहरे पर लाते हुए कहा “मेरा घर ही तो है जहां ज़माने भर के दुखों ने डेरा डाला हुआ है” महिला का कहना था ‘साल भर पहले मेरे पति का निधन हो चुका है’ मेरे चार बेटे और चार बेटियाँ हैं, पति के निधन के बाद गुजर बसर बहुत मुश्किल हो गया है आजकल तो घर का सामान बेचकर गुजारा कर रहे हैं बल्कि अब तो बेचने के लिए भी हमारे पास कुछ अधिक सामान नहीं बचा है.

जवान औरत की कहानी इतनी दुख भरी और ग़मगीन थी कि वह स्त्री उसके पास बैठ कर उसकी सहानुभूति और उसके दिल का बोझ हलका करती रही और जब तक वह जाने की अनुमति मांगी तब तक वे दोनों सहेलियां बन चुकी थीं. दोनों ने एक दूसरे से दोबारा मिलने का वादा लिया और संपर्क रखने की शर्त पर महिला उसके घर से बाहर निकली. संध्या से पहले उसने एक औरत के घर में प्रवेश किया, जहां एक और दुःख उसका यहां इंतजार कर रहा था.

उस महिला का पति एक खतरनाक रोग से पीड़ित था घर में बिस्तर पर पड़ा था. घर में बच्चों के लिए खाने-पीने का सामान न सिर्फ यह कि मौजूद ही नहीं था बल्कि बच्चे उस समय भी भूखे थे. महिला भागकर बाजार गई और जेब में जितने पैसे थे उन पैसों से कुछ दाल, आटा और घी आदि खरीद कर लाई. गृहिणी के साथ मिलकर जल्दी जल्दी खाना पकाया और अपने हाथों से उसके बच्चों को करूणा के साथ खिलाया.

कुछ देर और दिल बहलाने के बाद उन सबसे इस वादे के साथ अनुमति चाही कि वह कल शाम को फिर उनसे मिलने आएगी और दूसरे दिन फिर यह औरत एक घर से दूसरे घर और एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे इस उम्मीद से चक्कर लगाती रही कि कहीं उसे ऐसा घर मिल जाए जिस पर दुखों की कभी परछाई भी न पड़ी हों और वह वहाँ से एक सरसों के बीज प्राप्त कर सके मगर विफलता हर जगह उस की प्रतीक्षा में थी.

हर गुजरते दिन के साथ इसे एक नई दुख भरी कहानी का सामना होता, यह औरत दुख और दुखों से प्रभावित उन्हीं लोगों का एक हिस्सा बनती चली गई, वह अपने प्रति उन सभी में खुशियां बांटने की कोशिश करती रही. समय बीतने के साथ यह महिला बस्ती के हर घर का हिस्सा बनती चली गई. वह स्त्री न केवल अपना दुख भूल चुकी थी बल्कि वह यह भी भूल चुकी थी कि वह एक ऐसे घर की तलाश में निकली थी जिस पर कभी ग़मों की परछाई न पड़ी हो.

वह अवचेतन रूप दूसरे के दुखों में सहभागी होकर उनके दुखों का उपाय करती जा रही थी, जाने अनजाने उसका Social behavior बदलता जा रहा था. बस्ती के हकीम ने मानो उसे अपने दुखों पर हावी होने के लिए ऐसा आदर्श नुस्खा सुझाव दिया था जिसमें सरसों के बीज का मिलना तो असंभव था मगर अपने इकलौते बेटे की मौत के गम को भूलना संभव था और यह उसी पल ही शुरू हो गया था जब वह बस्ती के पहले घर में दाखिल हुई थी.

हाँ यह किस्सा कोई सामाजिक सुधार का नुस्खा नहीं है बल्कि यह तो एक खुला Invitation है हर व्यक्ति के लिए जो अपनी ego के खोल में बंद, दूसरों के दुखों और सुख से सरोकार रखे बिना अपनी दुनिया में खोया और मगन रहना चाहता है हालांकि दूसरों के साथ मेलजोल रखने और उनके दुखों और सुख में भाग लेने से खुशियां बढ़ती ही हैं कम नहीं हुआ करतीं. यह कहानी बताती है कि आपका Social behavior आप को पहले से ज्यादा खुश रहने वाला इंसान बना देगा.

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Absarul Haque

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