Education

बच्चों को School क्यों पसंद नहीं आते ?

बच्चों को School भेजना हर कोई चाहता है लेकिन एक गौर करने वाला प्रश्न है कि :

आखिर बच्चों को School क्यों पसंद नहीं आते ?

     वह बमुश्किल तीन साल की होगी, Papa की गोदी में जब Car से उतरी , तो चहक रही थी। जैसे ही बस्ता उसके कंधे पर गया, वह सुबकने लगी, रंग-बिरंगे पुते, दरवाजे तक पहुंची, तो दहाड़ने मरने लगी। वह School क्या है, खेल-घर है, वहां खिलऔने हैं, झूले हैं, खरगोश और कबूतर हैं, कटपुतलिया हैं, फिर भी बच्ची वहां जाना नहीं चाहती| क्योंकि आम बच्चे के लिय School एक जबरदस्ती, अनमने मन से जाने वाली जगह है। कई बार तो पढ़ाई पूरी कर लेने तक बच्चे को समझ हे नहीं आता है 12- 13 साल करते क्या रहा है| उसका आकलन Result के आधार पर होता है, जबकि वह अपनी पहचान और क़ाबलियत उसके बहार तलाशने को छटपटता है।
बच्चों को School क्यों पसंद नहीं आते ?

बच्चों को School क्यों पसंद नहीं आते ?

     ग्यारहवी पंचवर्षी योजना में लक्ष्य रखा गया था कि भारत में आठवीं Class तक जाते-जाते School छोड़ देने वाले बच्चों के 50 प्रतिशत को 20 प्रतिशत तक नीचे ले आया जाए। लेकिन आज भी कोई 40 प्रतिशत बच्चे Class 8th से आगे का School नहीं देख पाते हैं| यह जरुर है कि School न जाने के लिए मचल रही जिस बच्ची का जिक्र ऊपर किया गया है, उस सामाजिक- आर्थिक हालत के बच्चे आम तौर पर Class 8th के बाद के Drop out कि List में नहीं आते हैं। सरकारी Documents कहती हैं कि School की पढाई बीच में छोड़ने वालों में अधिकांस गरीब, उपेचितजाती और समाज के बच्च-बच्चियां होती है। बेशक ऐसे भी Example हैं कि इन्हीं स्थितियों में पढने वाले कुछ बच्चे College तक और उससे बहुत आगे तक भी गये| पर औसत बच्चों के लिए आज भी School ऐसी गतिविधि है, जो उनकी अपेछा के अनुरुप या मन के मुतबिक नहीं है। वहां पढाई जा रही Books में उसके उसे कुछ भी एैसा नहीं मिलता, जो उनके जीवन में काम आए।
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     जब बच्चा चाहता है कि वह गाय को करीब जाकर देखे, तब School में खिडकी बंद कर दी जाती है, जिससे बाहर झांककर वह गाय को Direct  देखता है। उसे गाय Blackboard पर सफ़ेद Lines और Words में पढाई जाती है। Ramayana कि जो Story बच्चो को कई सालों में समझ नहीं आती, वह उसे रामलीला देखने पर रट जाती है। ठेठ गाँव के बच्चों को पढाया जाता है कि ‘अ’ से ‘अनार’। न तो उसके इलाके में अनार होता है और न ही उसने कभी देखा या चखा है। सारा गाँव, जिसे गन्ना कहता है, उसे ईख पढ़ाया जाता है। रंग-आकृति-अंक-शब्द कि दुनिया में बच्चे का प्रवेश ही बेहद नीरस और अनमना-सा होता है| इस बीच उसे Doctor, Engineer, Collector, Pilot जैसी कई चीजें रटा दी जाती हैं और Mind में बैठा दिया जाता है कि पढ़-लिख कर इनमें से कुछ नहीं बना तो उसका जीवन बेकार है। यही मानसिकता, कस्बाई और शहरी गरीब बच्चों को घर से भागने, नशा करने व झूठ बोलने को प्रेरित करती है, जबकि गावं के बच्चे School छोड़ देना ही श्रैयस्कर समझते हैं ।
 (बच्चों को School ज़रूर भेजें लेकिन हमें इस पर भी ध्यान देना चाहए।)
                                                                                                                          पंकज चतुर्वेदी
                                                                                                                           वरिष्ठ पत्रकार
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About the author

Absarul Haque

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  • आपका ये आर्टिकल सभी माता – पिता के लिए बहुत फायदेमंद हैं,